एक सुफी संत मलिक मोहम्मद जायसी से संवत् 1540 में पद्मावत नाम से महाकाव्य लिखा । जा़यसी कभी चित्तोड नही गये । यह महाकाव्य अवधी भाषा में लिखा गया है ।
जायसी ने कल्पना के साथ- साथ इतिहास की सहायता से अपने पद्मावत की कथा का निर्माण किया ।
लेकिन कई इतिहासकारो ने इसे काल्पनिक बताया है जो सरासर गलत है ।
अलाउद्दीन खिलजी काल्पनिक नही ! रावल रतनसिंह काल्पनिक नही तो पद्मिनी आखिर कैसे काल्पनिक हो गई ? सती रानी पद्ममिनी चौहान, भाटी और मेवाड़ के वंश की शान आज भी है ।
जायसी ने सिंहल द्वीप का उल्लेख किया है जो आज का श्री लंका के नाम से जाना जाता है ।
पद्मावत नामक काव्य सती रानी पद्मिनी के जौहर से 237 वर्ष बाद लिखा गया है जिसमे कवि ने अपनी कल्पना से पद्मिनी का बखान और गुण गान किया है । लेकिन राजवंश में परम्परा रही है जिसमे इतिहास लिखे गये जिसकी पुष्टि चित्तौड जाकर स्वत:ही हो जाती है ।
कवि ने अपनी कल्पना से यह बताया है कि रानी ने अपने मुख का प्रतिबिंब खिलजी को दिखाया था लेकिन ऐसा करना भी तत्कालिन क्षत्रिय राजा के लिए एक मान मर्यादा का प्रश्न होने से मुमकिन नही था ।
सिंहल द्विप ( श्री लंका ) से जोडना भी कल्पना ही है ।चित्तौड से या राजस्थान से मंगाए जिस किसी लेख को पढकर पद्मावत लिखी होगी तब सिंहल नाम को बाद के इतिहासकारो ने सिंहल द्विप नाम दे दिया जो श्री लंका है लेकिन ऐसा नही है ।
क्षत्रिय इतिहास के अनुसार रानी पद्मिनी जैसलमेर के रावल पुनपालजी जिन्हे वहाँ से 1276 में निर्वासित कर दिया था उनकी रानी जामकँवर देवडी (चौहान) की कोख से 1285 में जन्म लिया था । रानी जामकँवर देवडी (चौहान ) नाडोल से जालोर आए देवडो की पुत्री थी । जालोर के चौहान शासको का विस्तृत राज्य था । जामकँवर देवडी के पिता यानी रानी पद्मिनी के नाना सा वर्तमान जालोर राज्य के सामंत थे ।
पंडित राम चंद्र शुक्ल के अनुसार सिंहल दरअसल सिरोही सीमा से लगता गुजरात का ही एक हिस्सा था । श्री लंका मे चौहानो का कोई गोत्र नही था और श्री लंका के लोग इतने गोरे नही होते है । इसलिए रानी पद्मिनी का श्री लंका से होना कवियो और संतो की कोरी कल्पना हो सकती है ।
सोनगरा सांचोर चौहानो के इतिहास के अनुसार हुकुमसिंह भाटी, गोरा और बादल जालोर के सोनगरा चौहान थे । गोरा जो थे वे बादल के चाचा थे । चित्तौड आने से पहले ये गुजरात में वीसलदेव सोलंकी के प्रधान थे । जब इनकी भाँजी का विवाह चित्तौड हुआ तो मामा गोरा और ममेरा भाई बादल सोलंकियो की सेवा छोडकर चित्तौड़ आ गये । राजपुतो मे एक परंपरा रही है कि विवाह के बाद बेटी के साथ सरदार, पुरोहित व और भी कई दासिया जाती रहती थी ।
और वैसे भी भाटी और मेवाड के राजघरानो के संबंध कोई नई बात नही थी । पहले से संबंध होते रहे थे । उस समय अलाउद्दीन खिलजी एक क्रुर शासक हुआ करता था ।
जब राजकुमारी पद्मिनी सयानी होने लगी तो रावल पुनपालजी को उनका विवाह जल्द से जल्द करने की चिंता सताने लगी उन्हे आशंका थी कि कही खिलजी के भेदियो की नजर पद्मिनी पर न पडे । क्योकी पद्मिनी के रुप की ख्याति हर जगह फैल रही थी । जब पुनपालजी को रावल रतनसिंह के नाम का श्रीफल संदेश आया तो पुनपालजी को संतोष हुआ क्योकी मेवाड राजघराना एक प्रतिष्ठित घराना भी था और वहाँ पर पद्मिनी के लिए मान सम्मान की कोई कमी नही आने वाली थी ।
संवत 1500 मे बडी धुमधाम से रावल रतनसिंह से साथ पद्मिनी 15 वर्ष की आयु मे विवाह बँधन से बँध गई । रावल रतनसिंह पद्मिनी को पाकर धन्य थे । पद्मिनी रुप से, बुद्धि से और चौहान वंश की माता और मामा के संस्कारो और पिता पुनपालजी भाटी के आशिर्वाद के द्वारा राजमहल मे सभी की पसंद बन गई थी ।
सभी रानी सा को बहुत आदर और सम्मान देते थे ।
जो दुरदर्शिता पुनपालजी ने दिखाई थी और पद्मिनी का विवाह रावल रतनसिंह के साथ किया था । संजोग वश वह वैवाहिक सुख बहूत ही अल्प समय मात्र 3 वर्ष का रहा । क्योकी 1503 में रानी ने जौहर कर लिया था । अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में पुरुस्कारो की लालसा से कुछ तुच्छ भृत्यो ने रानी के रुप का बखान कर डाला ।
पुनपालजी भाटी ने अपनी फुल जैसी कुँवरी को सुरक्षित करने के लिए जालोर से सिंहल जाकर और सिंहल से अरावली के क्षेत्र मेवाड के राजघराने मे ब्याह करके जो कभी कल्पना भी नही की होगी वह होने वाला था ।
वह होने वाला था जिस पर क्षत्रिय वंश युगो युगो तक याद रखने वाला था । वह होने वाला था जो भाटीयो की मान मर्यादा, मामा चौहानो की लाज और सिसोदिया वंश का सर इतिहास मे उँचा करने वाली थी । मान मर्यादा और कुल की लाज बचाने के लिए
किसी ने ऐसी कल्पना नही की होगी । किसी भी फिल्मकार के लिए 3 घंटे की फिल्म में इस महान बलिदान की कथा को पिरोना बस की बात नही हो सकती । किसी भी निर्देशक या निर्माता के फिल्म को बनाते वक्त आँखे नही भर जाए तो समझ लेना चाहिए कि उसके शिराओ मे वह रक्त नही जो रानी पद्मावति का नाम भी ले सके ।
1503 में रानी पद्मावती अपने साथ 16000 युवतियो ,वृद्धाओ और रानीयो के साथ जौहर की ज्वाला में अपना बलिदान देकर सदा सदा के लिए अमर हो गई ।
चित्तौड की धरा पर जो बलिदान लिखे गये है वे सदियो के लिए अमर है ।
जायसी ने कल्पना के साथ- साथ इतिहास की सहायता से अपने पद्मावत की कथा का निर्माण किया ।
लेकिन कई इतिहासकारो ने इसे काल्पनिक बताया है जो सरासर गलत है ।
अलाउद्दीन खिलजी काल्पनिक नही ! रावल रतनसिंह काल्पनिक नही तो पद्मिनी आखिर कैसे काल्पनिक हो गई ? सती रानी पद्ममिनी चौहान, भाटी और मेवाड़ के वंश की शान आज भी है ।
जायसी ने सिंहल द्वीप का उल्लेख किया है जो आज का श्री लंका के नाम से जाना जाता है ।
पद्मावत नामक काव्य सती रानी पद्मिनी के जौहर से 237 वर्ष बाद लिखा गया है जिसमे कवि ने अपनी कल्पना से पद्मिनी का बखान और गुण गान किया है । लेकिन राजवंश में परम्परा रही है जिसमे इतिहास लिखे गये जिसकी पुष्टि चित्तौड जाकर स्वत:ही हो जाती है ।
कवि ने अपनी कल्पना से यह बताया है कि रानी ने अपने मुख का प्रतिबिंब खिलजी को दिखाया था लेकिन ऐसा करना भी तत्कालिन क्षत्रिय राजा के लिए एक मान मर्यादा का प्रश्न होने से मुमकिन नही था ।
सिंहल द्विप ( श्री लंका ) से जोडना भी कल्पना ही है ।चित्तौड से या राजस्थान से मंगाए जिस किसी लेख को पढकर पद्मावत लिखी होगी तब सिंहल नाम को बाद के इतिहासकारो ने सिंहल द्विप नाम दे दिया जो श्री लंका है लेकिन ऐसा नही है ।
क्षत्रिय इतिहास के अनुसार रानी पद्मिनी जैसलमेर के रावल पुनपालजी जिन्हे वहाँ से 1276 में निर्वासित कर दिया था उनकी रानी जामकँवर देवडी (चौहान) की कोख से 1285 में जन्म लिया था । रानी जामकँवर देवडी (चौहान ) नाडोल से जालोर आए देवडो की पुत्री थी । जालोर के चौहान शासको का विस्तृत राज्य था । जामकँवर देवडी के पिता यानी रानी पद्मिनी के नाना सा वर्तमान जालोर राज्य के सामंत थे ।
पंडित राम चंद्र शुक्ल के अनुसार सिंहल दरअसल सिरोही सीमा से लगता गुजरात का ही एक हिस्सा था । श्री लंका मे चौहानो का कोई गोत्र नही था और श्री लंका के लोग इतने गोरे नही होते है । इसलिए रानी पद्मिनी का श्री लंका से होना कवियो और संतो की कोरी कल्पना हो सकती है ।
सोनगरा सांचोर चौहानो के इतिहास के अनुसार हुकुमसिंह भाटी, गोरा और बादल जालोर के सोनगरा चौहान थे । गोरा जो थे वे बादल के चाचा थे । चित्तौड आने से पहले ये गुजरात में वीसलदेव सोलंकी के प्रधान थे । जब इनकी भाँजी का विवाह चित्तौड हुआ तो मामा गोरा और ममेरा भाई बादल सोलंकियो की सेवा छोडकर चित्तौड़ आ गये । राजपुतो मे एक परंपरा रही है कि विवाह के बाद बेटी के साथ सरदार, पुरोहित व और भी कई दासिया जाती रहती थी ।
और वैसे भी भाटी और मेवाड के राजघरानो के संबंध कोई नई बात नही थी । पहले से संबंध होते रहे थे । उस समय अलाउद्दीन खिलजी एक क्रुर शासक हुआ करता था ।
जब राजकुमारी पद्मिनी सयानी होने लगी तो रावल पुनपालजी को उनका विवाह जल्द से जल्द करने की चिंता सताने लगी उन्हे आशंका थी कि कही खिलजी के भेदियो की नजर पद्मिनी पर न पडे । क्योकी पद्मिनी के रुप की ख्याति हर जगह फैल रही थी । जब पुनपालजी को रावल रतनसिंह के नाम का श्रीफल संदेश आया तो पुनपालजी को संतोष हुआ क्योकी मेवाड राजघराना एक प्रतिष्ठित घराना भी था और वहाँ पर पद्मिनी के लिए मान सम्मान की कोई कमी नही आने वाली थी ।
संवत 1500 मे बडी धुमधाम से रावल रतनसिंह से साथ पद्मिनी 15 वर्ष की आयु मे विवाह बँधन से बँध गई । रावल रतनसिंह पद्मिनी को पाकर धन्य थे । पद्मिनी रुप से, बुद्धि से और चौहान वंश की माता और मामा के संस्कारो और पिता पुनपालजी भाटी के आशिर्वाद के द्वारा राजमहल मे सभी की पसंद बन गई थी ।
सभी रानी सा को बहुत आदर और सम्मान देते थे ।
जो दुरदर्शिता पुनपालजी ने दिखाई थी और पद्मिनी का विवाह रावल रतनसिंह के साथ किया था । संजोग वश वह वैवाहिक सुख बहूत ही अल्प समय मात्र 3 वर्ष का रहा । क्योकी 1503 में रानी ने जौहर कर लिया था । अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में पुरुस्कारो की लालसा से कुछ तुच्छ भृत्यो ने रानी के रुप का बखान कर डाला ।
पुनपालजी भाटी ने अपनी फुल जैसी कुँवरी को सुरक्षित करने के लिए जालोर से सिंहल जाकर और सिंहल से अरावली के क्षेत्र मेवाड के राजघराने मे ब्याह करके जो कभी कल्पना भी नही की होगी वह होने वाला था ।
वह होने वाला था जिस पर क्षत्रिय वंश युगो युगो तक याद रखने वाला था । वह होने वाला था जो भाटीयो की मान मर्यादा, मामा चौहानो की लाज और सिसोदिया वंश का सर इतिहास मे उँचा करने वाली थी । मान मर्यादा और कुल की लाज बचाने के लिए
किसी ने ऐसी कल्पना नही की होगी । किसी भी फिल्मकार के लिए 3 घंटे की फिल्म में इस महान बलिदान की कथा को पिरोना बस की बात नही हो सकती । किसी भी निर्देशक या निर्माता के फिल्म को बनाते वक्त आँखे नही भर जाए तो समझ लेना चाहिए कि उसके शिराओ मे वह रक्त नही जो रानी पद्मावति का नाम भी ले सके ।
1503 में रानी पद्मावती अपने साथ 16000 युवतियो ,वृद्धाओ और रानीयो के साथ जौहर की ज्वाला में अपना बलिदान देकर सदा सदा के लिए अमर हो गई ।
चित्तौड की धरा पर जो बलिदान लिखे गये है वे सदियो के लिए अमर है ।

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